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सबसे पहले फ्रांस की छोटी सी रिसर्च ने बताया था कि कोरोना में मदद करती है हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन, लेकिन डॉक्टर इसे प्रभावी दवा नहीं मानते

  • फ्रांस में 11 लोगों पर हुई एक दूसरी रिसर्च में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन के बेहद भयावह परिणाम आए थे
  • ट्रम्प के दावे को अमेरिका के शीर्ष इंफेक्शियस डिसीज एडवाइजर डॉ. एंथनी फौसी ने नकारा है

हलचल टुडे

Apr 08, 2020, 04:52 PM IST

नई दिल्ली. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पिछले कुछ दिनों से एंटी मलेरिया ड्रग हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन के लिए बेताब दिख रहे हैं। इसके लिए उन्होंने भारत से पहले यह दवा देने की गुहार लगाई और फिर न मिलने पर जवाबी कार्रवाई की धमकी तक दे डाली। ट्रम्प का दावा है कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन कोरोनावायरस के इलाज के लिए बेहतर दवा है। उन्होंने ट्वीट भी किया था कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को एजिथ्रोमाइसिन एंटीबॉयोटिक के साथ लेना बड़ा गेम-चेंजर हो सकता है। दरअसल, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन से इलाज होने की बात सबसे पहले फ्रांस में हुए एक छोटे से अध्ययन से आई थी। यह अध्ययन प्रकाशित होने से पहले ही दुनियाभर में छा गया। जिसके बाद हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को संभावित इलाज के रूप में देखा जाने लगा।
ट्रम्प के इस दावे को दुनियाभर के हेल्थ एक्सपर्ट ने गलत ठहराया है। अमेरिका के शीर्ष इंफेक्शियस डिसीज एडवाइजर डॉ. एंथनी फॉसी ने भी कहा है कि इस दवा के कोई सकारात्मक परिणाम  सामने नहीं आए। इसके बावजूद ट्रम्प ने अपना दावा बार-बार दोहराया है। उन्होंने पत्रकारों से कहा, ‘‘मैं एक स्मार्ट व्यक्ति हूं और मैं बहुत सही होता हूं।’’ पिछले हफ्ते फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन को आपातकाल में उपयोग करने वाली दवा घोषित किया। न्यूयॉर्क के अधिकारियों ने बताया है कि करीब 4 हजार संक्रमित लोगों का इलाज इसी ड्रग से हो रहा है। भारत में भी स्वास्थ्य मंत्रालय ने गर्भवती महिलाओं को छोड़कर बाकी मरीजों को डॉक्टरों की पूरी निगरानी में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और एजिथ्रोमाइसिन का कॉम्बिनेशन देने के लिए कहा है। 

फ्रांस में 40 मरीजों पर हुई थी रिसर्च
मार्च की शुरुआत में फ्रांस के मार्सेल में वैज्ञानिकों ने एक कोरोनावायरस के 40 मरीजों पर हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को लेकर एक रिसर्च की थी। इस रिसर्च को फ्रांस के डॉक्टर और माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट दिदिएर रॉल इस अध्ययन के प्रमुख थे। इसमें आधे से ज्यादा मरीजों ने बताया था कि दवा लेने के तीन से छह दिनों में उन्हें आराम महसूस हुआ। इसके बाद रॉल ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन को कोरोना के इलाज के लिए कारगर बताया। इस अध्ययन को इंटरनेशनल एंटीमाइक्रोबियल एजेंट्स (आईजेएए) जर्नल में पब्लिश होना था, लेकिन पब्लिश होने से पहले ही यह अध्ययन अमेरिकी फाक्स न्यूज में टकर कार्लसन के ‘टुनाइट’ शो में दिखाया गया। न्यूज में कहा गया है कि कोरोनावायरस का 100% इलाज खोज लिया गया है।  यह खबर आग की तरह वायरल हो गई। इसके बाद ही ट्रम्प ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन के सकारात्मक परिणाम मिलने का दावा किया था।

फ्रांस में इसके बाद एक और रिसर्च हुई जो बहुत भयावह था
फ्रांस में इस रिसर्च के बाद एक और शोध हुआ। यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ पेरिस और सेंट लुई हॉस्पिटल ने किया। फ्रांस के मशहूर वैज्ञानिक डेरेक ओव ने साइंस मैगजीन में इस शोध के बारे में लिखा है। डेरेक ने लिखा कि दूसरा अध्ययन 11 मरीजों पर किया गया था। उनकी उम्र 58 साल के करीब थी। इनमें से आठ में दूसरी बीमारियों भी थीं। दो मोटापे, पांच कैंसर और एक को एचआईवी था। इनको हाइड्रॉक्सीक्लोक्विन (600 एमजी) और एजिथ्रोमाइसिन (500 एमजी) मिलाकर दी गई। नतीजे में एक मरीज की मौत हो गई और दो को आईसीयू में भर्ती कराया गया। एक को हृदय की अनियमितता की वजह से उपचार रोकना पड़ा। बाकी बचे लोग दवा खिलाने के बाद भी कोरोना पॉजिटिव पाए गए।

हेल्थ एक्सपर्ट ने भी चेताया- इलाज का ठोस सुबूत नहीं
इस अध्ययन पर हेल्थ एक्सपर्ट्स ने चेताया है कि यह अध्ययन बहुत ही छोटे स्तर पर हुआ है और इससे कोरोनावायरस के इलाज का कोई ठोस सुबूत भी नहीं मिलता। फ्रांस के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस दवा के इस्तेमाल पर चेतावनी भी जारी की है। स्वास्थ्य मंत्री ओलिवर वेरन ने कहा कि किसी को भी बिना डॉक्टरों की सलाह और सख्त चिकित्सा देखरेख के हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी ने कहा है कि इन निष्कर्षों के बावजूद, किसी बीमारी में किसी भी दवा का इस्तेमाल बिना फुल क्लीनिकल ट्रायल के करना गलत है। यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन कोरोनावायरस के इलाज में मददगार हो सकती है या नहीं। अभी कोरोनावायरस के मरीजों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन नहीं लेना चाहिए।

इस वजह से हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन से इलाज की आस

रुहेलखंड यूनिवर्सिटी में फार्मेसी डिपार्टमेंट असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अमित वर्मा ने बताया कि हाइडॉक्सीक्लोरोक्विन वीक बेस दवा होती है। अभी तक जो कुछ पता चला है उसके मुताबिक कोरोनावायरस सेल्स (कोशिकाओं) में एंडोजोम्स के जरिए प्रवेश करता है। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन सेल्स के एंडोजोम्स के पीएच लेवल को बढ़ा देता है। यानी एसिटिक एंडोजोम्स को क्षारीय में बदल देता है। इससे वायरस का रिएक्शन सेल्स में नहीं हो पाता है। इस तरह से ही हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन कोरोनावायरस से बचाती है। हालांकि, इसका कोई ठोस सुबूत नहीं है।

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा के बारे में जानिए
हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को उसके ब्रांड नेम प्लाक्वेनिल के नाम से भी बेचा जाता है। यह मलेरिया की दवा है। यह क्लोरोक्वीन का कम पॉवर का वर्जन है। यह भी एक मलेरिया की दवा है। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को आर्थराइटिस और लूपस बीमारी के इलाज में भी इस्तेमाल में लाया जाता है।  लूपस बीमारी में त्वचा पर सूजन आ जाती है। इससे जोड़ों, त्वचा, गुर्दों, रक्त कोशिकाओं, दिमाग, दिल और फेफड़ों पर बुरा असर पड़ता है।

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