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बच्चा अगर हार से निराश हो तो उसे समझाएं, हार-जीत खेल का हिस्सा होते हैं

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21 मिनट पहले

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पैरेंट्स के सामने कई तरह की चुनौतियां होती हैं। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, उनकी जरूरतें भी बदलती जाती हैं। उनमें कई तरह की फीलिंग एक साथ चलती है और वह बहुत से बदलावों से गुजरते हैं।

अक्सर आपने देखा होगा कि बच्चे पियर ग्रुप में रहने के चलते अलग-अलग व्यवहार करने लगते हैं। 5 साल तक आते-आते उनके अंदर कॉम्पिटीटिवनेस की भावना आ जाती है। यह उनके अंदर लंबे समय तक बनी रहती है। इस दौरान वह किसी भी तरह की हार पसंद नहीं करते और न ही किसी का आगे निकलना उन्हें पसंद होता है। वे हमेशा खुद को ही विजेता मानते हैं। ऐसे में उनके अंदर अलग तरह की फीलिंग डेवलप होती है जो उनके व्यवहार में भी दिखता है।

अगर बच्चों में कॉम्पिटीटिवनेस की फीलिंग हो तो उन्हें समझना जरूरी

  • यह समझना मुश्किल, लेकिन जरूरी हो जाता है कि आखिर बच्चों को क्या पसंद है, किसी चीज को लेकर उनका रिएक्शन क्या है और वह क्या चाहते हैं? टेक्सास की रहने वाली लिंडा बेलंटन मोर्राड बताती हैं कि उनका 5 साल का बच्चा स्कूल, घर और डांस क्लास में रोता है। उसके अंदर कॉम्पीटीशन की भावना इसकी वजह है।
  • वह लाइन में फर्स्ट खड़ा होना चाहता है और हर खेल में जीतना चाहता है। वो उस खेल को खेलना नहीं चाहता जिसमें वह जीत नहीं सकता। लिंडा बताती हैं कि उन्होंने उसे समझाया कि हर बार तुम जीतो ऐसा नहीं हो सकता।
  • वहीं इस तरह के केस में एक्सपर्ट्स का मानना है – कॉम्पीटीशन की भावना से डील करना एक लंबा प्रोसेस है। इस समय यह समझना जरूरी होता है कि बच्चा किस स्टेज पर है और उसके अंदर किस तरह की भावनाएं हैं। इसलिए इस स्टेज में उसकी पर्सनलिटी पर ध्यान देना और गाइड करना बेहद जरूरी होता है।

बच्चों का डेवलपमेंट लेवल क्या है?

  • क्लीनिक एसोसिएट प्रोफेसर शैली बेवाइल हंटर बताती हैं कि 5 साल की उम्र में ज्यादातर बच्चे गेम्स के रूल याद करना शुरू करते हैं। वह इसे याद करने में पूरी एनर्जी लगा देते हैं। उनके लिए खेल के रूल बहुत जरूरी होते हैं। वे रूल को सिर्फ याद नहीं करते हैं, बल्कि अगर खेल में उनका पालन नहीं होता तो दुखी भी हो जाते हैं।
  • भावनात्मक रूप से प्री और शुरूआती एलीमेंट्री स्कूल में बच्चे अपनी फीलिंग्स पर खुद कंट्रोल करना सीखते हैं। इस स्टेज में वे सही-गलत का फैसला भी करते हैं।
  • अमेरिका में हुई एक स्टडी में 5 साल के बच्चों को दो चॉइस दी गई। पहली चॉइस थी कि सभी को बच्चों को एक स्टीकर दिया जाए। दूसरी चॉइस थी कि एक बच्चे को दो स्टीकर दिए जाएं और दूसरे बच्चे को तीन स्टीकर दिए जाएं। इसमें बच्चों ने पहली चॉइस को चुना। इससे समझ आता है कि बच्चों को यह अच्छा नहीं लगता कि कोई उनसे बेहतर करे।

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डेवलपमेंट से ही जुड़ा है बच्चों का व्यवहार

  • क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट बीकी कैनेडी का कहना है कि बच्चों में प्रतिस्पर्धा की फीलिंग्स को खत्म करने के लिए उनके इमोशन को प्री-रेगुलेट कर देना चाहिए। उन्हें गेम के पहले ही बता देना चाहिए कि हार-जीत हर खेल का हिस्सा है। इसमें निराश होने वाली बात नहीं है। बच्चों को हारने पर मोटिवेट किया जा सकता है।बच्चों के व्यवहार पर बात करें तो बच्चे का व्यवहार कहीं न कहीं उसके डेवलपमेंट से जुड़ा है। इसमें यह पता लगता है कि उसका विकास किस तरह की सिचुएशन में हुआ और उसकी प्रतिस्पर्धा की फीलिंग और व्यवहार पर कैसे कंट्रोल किया जा सकता है?
  • किसी भी गेम या प्रतिस्पर्धा से पहले हमें बच्चों की भावनाओं का अंदाजा लगाना चाहिए। इससे हम बच्चों के व्यवहार को आसानी से समझ सकेंगे। बच्चों में अक्सर इस तरह की प्रतिस्पर्धा को लेकर कोई न कोई फीलिंग रहती है।

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