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गैस त्रासदी ने सब कुछ तबाह किया, लेकिन चंपा देवी और रशीदा बी ने हिम्मत नहीं हारीं, अब गरीब बच्चों का इलाज कराती हैं

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भोपाल2 मिनट पहलेलेखक: सुमित पांडेय

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भोपाल में गैस पीड़ित गरीब परिवार के बच्चों की सेवा कर रहीं चंपा देवी शुक्ला और रशीदा बी। तस्वीर 2003 की है, जब उन्हें अमेरिका में गोल्डमैन पर्यावरण अवार्ड दिया गया था।

भोपाल की उन 2 साहसी महिलाओं की कहानी, जिनके परिवार गैस त्रासदी में तबाह हो गए, उन्होंने अपना सब कुछ खो दिया। उसके बाद भी हिम्मत नहीं हारीं और नए सिरे से जिंदगी जीने के लिए खुद को खड़ा किया। 36 साल से अटूट दोनों दोस्त आज त्रासदी के शिकार उन गरीब परिवारों के जीवन में खुशियां लाने की कोशिश में जुटीं हैं, जिनके घर पर गैस के असर से आज भी विकलांग बच्चे पैदा हो रहे हैं। उन्होंने अमेरिका में मिले पुरस्कार में मिले 1.20 लाख डालर से 2004 में चिंगारी संस्था की नींव डाली। इसके जरिए गैस त्रासदी के शिकार उन तमाम मानसिक मंदित, दिव्यांग बच्चों का इलाज और पेट भरती हैं।

हम बात कर रहे हैं चिंगारी की संस्थापक चंपा देवी शुक्ला और रशीदा बी की, जो भोपाल गैस पीड़ितों की लड़ाई को पूरी दुनिया में ले गईं। डाउ केमिकल के खिलाफ आंदोलन छेड़ा। स्विटजरलैंड, इसराइल, अफ्रीका और अमेरिका में कंपनी के विरोध में झाडू आंदोलन चलाया। दोनों महिलाएं की दोस्ती, इंसानियत और सामाजिक समरसता की मिसाल हैं।

चिंगारी संस्था में अपने बच्चों के साथ चंपा देवी शुक्ला और रशीदा बी।

चिंगारी संस्था में अपने बच्चों के साथ चंपा देवी शुक्ला और रशीदा बी।

गैस त्रासदी ने चंपा देवी शुक्ला से उनका पति बद्रीप्रसाद शुक्ला, तीन बेटे राजेश, दिनेश और सुनील को छीन लिया। मंझले बेटे दिनेश की मौत 2013 में हुई थी, उसकी बेटी सपना भी गैस के असर से विकलांग पैदा हुई। चंपा दीदी ने बताया कि ‘नातिन के एक तरफ की नाक, होंठ और दांत खराब थे, उसके इलाज के दौरान मुझे लगा कि जब हमें इलाज कराने में इतनी परेशानी है तो गैस पीड़ित गरीब बच्चों का इलाज कैसे करा पाते होंगे।’

चंपा दीदी ने कहती हैं कि- ‘यहीं से हमें गरीब दिव्यांग बच्चों के इलाज और देखभाल के लिए संस्था खोलने का विचार आया, लेकिन आर्थिक परेशानी की वजह से ये नहीं हो सका। 2003 में मुझे और रशीदा बी को अमेरिका का गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार मिला और इसमें पुरस्कार स्वरूप हमें 1.20 लाख डालर (तब भारतीय करेंसी में 58 लाख रुपए) मिले। हमने वहीं पर मंच से घोषणा कर दी कि इससे एक पैसा नहीं लेंगे और सारा पैसा बच्चों की संस्था खोलने में लगा देंगे।’ आज चिंगारी में 300 बच्चों का अलग-अलग शिफ्ट में इलाज किया जाता है।

संस्थान में

संस्थान में

दोस्ती कैसे हुई रसीदा बी ने बताया- ‘गैस हादसे के बाद भोपाल खाली हो गया था, हम परिवार सहित भागकर सोहागपुर चले गए थे। भोजन के लाले पड़ गए, क्योंकि वहां जाकर भी सब बीमार ही रहे। फिर छह महीने बाद हम लौटे तो यहां पर सरकार ने एक योजना बनाई थी कि गैस पीड़ितों के पुनर्वास किया जाए। रोजगार देने के लिए 40 सेंटर बनाए, जिसमें सिलाई सेंटर, स्टेशनरी और लेदर काम शुरू किया गया। हमने स्टेशनरी में अपना नाम लिखवाया। इसमें 100 महिलाओं को लिया गया, जिसमें 50 मुस्लिम और 50 हिंदू महिलाएं थीं। वहीं पहली बार 1985 में चंपा दीदी से मुलाकात हुई। दीदी बड़ी सी बिंदी लगाती थीं तो मैं उन्हें बंगालन समझती थी और मैं शूट पहनती थी तो दीदी मुझे पंजाबन समझती थीं।

रशीदा बी कहती हैं- ‘जब तीन महीने बाद सेंटर बंद होने लगा तो महिलाओं ने हमें कहा कि बात करो तो मैंने कहा कि कभी पुरुषों से बात नहीं की और यहां कैसे करेंगे। चंपा दीदी ने हौसला बढ़ाया कहा- बात उठानी पड़ी। उस वक्त कलेक्टर प्रवेश शर्मा आने वाले थे, उनसे बात करनी थी। 150 रुपए महीने मिलते थे, 5 रुपए रोज के हिसाब से। फिर हमने बात की, तब की दोस्ती 36 साल बाद आज तक अटूट बनी हुई है।’

संस्थान में एक बच्चे से दुलारतीं चंपा देवी शुक्ला।

संस्थान में एक बच्चे से दुलारतीं चंपा देवी शुक्ला।

चंपा देवी ने बताई- उस खौफनाक रात की कहानी
चंपा दीदी बताती हैं, ‘मेरे परिवार में मैं, पति, तीन बेटे और दो बेटियां थीं। रात को करीब 12 बजे के बाद जिस वक्त गैस निकली, उस समय हम बस स्टैंड की तरफ भागे, बेटे आठ और 10 साल के थे, वो भीड़ के साथ आगे निकल गए। दो बेटियां और छोटा बेटा साथ था। भागते समय पति का पैर एक बड़े पत्थर से टकराया और वह गिर गए। उनके पेट में गंभीर चोट आई और उनका यूरिन ब्लैडर फट गया और वह तड़पने लगे। पति ने कहा कि तुम बच्चों को लेकर यहां से चली जाओ, मैंने कहा नहीं जाऊंगी। मरेंगे तो सब साथ मर जाएंगे, लेकिन मैं छोड़कर नहीं जाऊंगी। इस तरह पूरी रात डर और खौफ के साए में बैठे रहे। सुबह पांच बजे सायरन बजा और एनाउंसमेंट हुआ कि अब गैस बंद हो गई है, आप लोग घर जाइए।

‘यहां से हम आगे बढ़े तो एक मुसलमान परिवार ऑटो में मिला। उन्होंने कहा कि इनकी हालात बहुत खराब है। कहा कि चलो आपको हमीदिया छोड़ दें, लेकिन हमीदिया में लाशों के छल्ले लगे हुए थे। वहां पर अगर चीखकर कोई बेहोश हो रहा था तो उसे लाशों के ढेर में फेंक दिया जा रहा था। हम वहां से किसी तरह से भाग आए, डर था कहीं पति को भी लाशों के डेर में न फेंक दें। इसके बाद पति 12 साल तक जिए, लेकिन वह तिल-तिल मरते रहे, क्योंकि उनका यूरिन ब्लैडर फट गया था और उन्हें बार-बार बाथरूम जाना पड़ रहा था। उनका 1997 में देहांत हो गया। गैस के असर से अपने परिवार को एक-एक कर मरते देखा है। अब बस दोनों बेटियां हैं और उनके बच्चे हैं। वह भी भोपाल आ गए हैं।’

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