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जिगर के टुकड़ाें काे बहला ड्यूटी पर आती हैं, खुद घर जा नहीं सकती तो फोन पर खाना बनाना सिखाती हैं, खाकी का फर्ज पूरा निभाती हैं

हलचल टुडे

Apr 07, 2020, 10:12 AM IST

लाइफस्टाइल डेस्क. राजस्थान के चार थाना इलाकों में कर्फ्यू है, बाकी शहर में लॉकडाउन यानी कर्फ्यू जैसे ही हालात हैं। आमजन घरों में हैं। वहीं पुलिस पूरी मुस्तैदी के साथ पहले से अधिक समय फील्ड में गुजार रही है। इनमें ऐसी महिला पुलिसकर्मी भी हैं जो लोगों के घरों को सुरक्षित रखने अपने घर और बच्चों को छोड़कर ड्यूटी पर तैनात हैं। ड्यूटी के दौरान ही एक मां और गृहिणी का फर्ज भी निभा रही हैं।

सीमा, महिला कांस्टेबल, उदयमंदिर थाना

मासूम बेटी काे बाताें में उलझाकर ड्यूटी पर निकलना पड़ता है

पांच साल की बेटी नव्या को घर में ही छोड़कर ड्यूटी पर जाना पड़ता है। हर रोज उसे रोती हुई छोड़कर निकलना पड़ता है। ड्यूटी से घर जाने तक वो सो जाती है। लेकिन सुबह जब देखती है तो उसे खुश करने लिए अलग से उसको बहलाती हूं। फिर उसे बातों में उलझाकर घर से निकल जाती हूं। ऐसे में अभी कोरोना के चलते बेटी से मिलते समय सतर्कता भी रखती हूं।

मीरा चौधरी, महिला कांस्टेबल, नागौरी गेट

तीन साल के बेटे काे साथ लाती हूं, ड्यूटी की जगह छाया देख बिठाती हूं

लॉकडाउन के कुछ दिन तक बेटा मयंक परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहता था। लेकिन बाद में रोने लगता और जिद करता था। ऐसे में उसे ड्यूटी पर साथ ही रखती हूं। नागौरी गेट थाना इलाके में कर्फ्यू है, ऐसे में उसे साथ रखकर ड्यूटी करती हूं। इस दौरान परेशानी नहीं होती, सोशल डिस्टेंसिग भी रखनी जरूरी होती है, तो ऐसे में जहां पर ड्यूटी होती है, उसे छांव में बिठा देती हूं।

किरण गोदारा, महिला थाना प्रभारी

दोनों बेटियों से बस फोन पर ही बात हो पाती है

लॉक डाउन के बाद से घर कम ही जाना होता है। लेकिन जब भी घर से निकलती हूं तो दोनों बेटियां दिव्या व जाह्नवी रोने लग जाती थी। हर दिन ये ही कह कर निकलती थीं कि आज घर जल्दी आ जाऊंगी। देर रात जब घर पहुंचती तो दोनों सो जाती थी। जब से कुड़ी थाना इलाके में कर्फ्यू लगा है, तब से घर जाना ही नहीं होता। बस फोन पर ही बात होती है।

परमेश्वरी, सब इंस्पेक्टर, थाना झंवर

3 साल के बेटे के साेने के बाद पहुंचती हूं, उठने से पहले निकलती हूं

पहले ड्यूटी से जब भी घर पहुंचती ताे साढ़े तीन साल का प्रत्युश लिपट जाता था। लाॅकडाउन के बाद से फील्ड से घर जाना कम होता है। जब भी घर जाती हूं, वो सो चुका होता है। उसके जागने से पहले ही ड्यूटी के लिए निकल जाती हूं, ताकि उसे संक्रमण के संभावित खतरे से दूर रख सकूं। परिवार को सुरक्षित रखने के लिए घर के अलग कमरे में ही रहती हूं।

मुक्ता पारीक, एसएचओ, कुड़ी थाना

मैं घर नहीं जा पाती, बेटे काे वीडियाे काॅल पर खाना बना सिखाया

जब से लॉकडाउन हुआ, तब से अधिकांश समय फील्ड में ही गुजरता है। घर जाना ही नहीं हो पाता। थाने को ही घर बना लिया है। ऐसे में बेटे ईशान सत्यप्रकाश को घर में अकेले रहना पड़ रहा है। बेटे को खाने की परेशानी कुछ दिन रही। ऐसे में मैं उसे वीडियो कॉल करने का बोलती। उसे कॉल पर ही खाना कैसे बनाना है, सिखाती। कुछ दिनाें की प्रैक्टिस के बाद अब वो खुद खाना बनाना सीख गया है।

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